Meet Shivani Gusai from Uttarakhand - ‘उड़न परी’


Shivani Gusai from Uttarakhand 

शिवानी गुसाईं! --मिसाल ! --   उम्मीदों के ‘पंखों’ से होंसलों की ऊँची ‘उड़ान’ भरकर ‘सपनों’ को हकीकत में बदलती पहाड़ की ‘उड़न परी’ !

--- महज १३ बरस की छोटी आयु में अपने हैरतंगेज कारनामे से देश ही नहीं अपितु दुनिया को भी अचंभित कर दिया था। आज वो देश के युवाओं के लिए आइकॉन बनी है। जिद और जज्बा ऐसा की पहाड़ के हर कोने की ख़ाक छान दी। होंसले इतने बुलंद की आपदा के बाद सुरक्षित केदारनाथ यात्रा का सन्देश देने के लिए विपरीत परस्थितियों में केदार धाम जा पहुंची। अपनी माटी से इतना प्यार की पहाड़ों का भ्रमण करके लोगों को पहाड़ आनें का न्योता दे रहीं हैं।

--- जी हाँ आज ग्राउंड जीरो से केदार घाटी भ्रमण से थोडा हटकर एक ऐसी ही लड़की की परिकथा जो हकीकत है से आपको रुबरु करा रहें हैं जिसके सपने न केवल पहाड़ जैसे हैं। अपितु उसके होंसलो की ऊँची उड़ान के लिए शायद नीला आसमान भी छोटा पड़ जाय। पहाड़ की इस उड़नपरी का नाम है शिवानी गुसाईं।  

    ८ अप्रैल १९८८ को मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के ग्राम कफोल्स्यु, कल्जीखाल निवासी श्रीमती विजय लक्ष्मी गुसाईं (उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी )और सुरेन्द्र सिंह गुसाईं के घर एक बिटिया का जन्म हुआ। माता पिता ने अपने इस बेटी का नाम शिवानी रखा। बचपन से ही शिवानी न केवल पढने लिखने में होनहार थी अपितु अन्य कार्यों में भी निपुण थी। लेकिन जो सबसे ख़ास बात शिवानी में थी वो अपने माटी और पहाड़ से असीम प्यार। 

खासतौर पर शिवानी को यहाँ की नदिया, गाड, गदेरे, गगनचुम्बी पहाड़, लोकभाषा, लोकसंस्कृति, जिन्हें वो कभी भी नहीं भुलाना चाहती थी। शिक्षक माता पिता की बेटी होने के बाबजूद शिवानी के माँ-पिताजी ने कभी भी उन पर बंदिशों की पाबंदी नहीं रखी बल्कि उन्होंने अपने 6 बच्चों  में 4 बेटियां और दो बेटो को अपना भविष्य खुद बनाने की खुली छुट दी। जिसका नतीजा ये हुआ की शिवानी की दो बहने एक हॉकी में नेसनलऔर दूसरी राज्य की पहली लोक नृत्यांगना, में राष्ट्रीय स्तर पर अवार्ड पा चुकी हैं तो एक भाई क्रिकेट और एक भाई रचनात्मक गतिविधियों में अपनी अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हैं।

इन सबके बीच शिवानी ने अपनी अलग राह चुनी। १२ वीं के बाद आईटी से पोलिटेक्निक किया। फिर बीकॉम, एमकॉम के बाद एमबीए की उच्च शिक्षा ग्रहण की। वर्तमान में शिवानी महिला तकनीकी संस्थान प्रेमनगर देहरादून में कार्यरत हैं।

बहुमुखी प्रतिभा की धनी शिवानी स्कूल और पोलिटेक्निक में राज्य स्तर पर टेबिल टेनिस में सिल्बर और गोल्ड मेडेलिस्ट रहीं हैं। लेकिन शिवानी के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी ८ जनवरी २००१ को जब वह महज १३ बरस की छोटी सी उम्र में विश्व की सबसे कम आयु की पैराग्लाइडिंग बनी। 

पौडी से 10 किमी दूर कंडारा हिल में उडान भरकर शिवानी नें सबसे कम उम्र में इतिहास रखकर पूरे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया था। शिवानी की यह उपलब्धि ""लिम्का बुक ऑफ रिकॉड"" में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। दूसरा रिकार्ड प्रथम "" नेसनल उत्कृष्ट बाल पुरुष्कार""2004 विज्ञान भवन में यू0पी0 उत्तराखंड की एक मात्र बेटी ने जिसके बाद से शिवानी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। शिवानी ने मन ही मन ठान लिया था की अब वो एडवेंचर को ही अपने जीवन का उद्देश्य बनायेगी। इसलिए वह महज पैराग्लाइडिंग तक ही सिमित नहीं रही बल्कि बेहद कम उम्र में शिवानी ने पर्वतरोहण, राफ्टिंग, स्कींग, कैम्पिंग, ट्रेकिंग में महारथ हाशिल की। औली में प्रथम एशियाई खेलों के दौरान शिवानी पूरे ३ महीने औली में ही रही थी। ताकि कंही से कोई कमी न रह जाय। और एशियाई खेलों मे प्रतिभाग भी किया। उत्तराखंड में पैराग्लाइडिंग की उपेक्षा पर शिवानी बेहद आहत है। 

अपने सपनों को साकर करने के लिए शिवानी ने ""माई एडवेंचर क्लब""यानी की (मैक )की स्थापना की। जिसके तहत अब तक ३ हजार से भी अधिक युवा  अभी तक जुड़ चुकें हैं। मैक के जरिये शिवानी युवाओं की एडवंचर, पर्यटन, लोकसंस्कृति, और इको पर भी ध्यान देते हूये इनको लुप्त होने से बचाने और उत्तराखण्ड में इनको बढ़ावा देने का कार्य कर रहीं हैं। साथ ही साथ लोगों को  वापस अपने पहाड़ की और लौटने की वकालत भी कर रहीं हैं। 
 
मैक के बैनर तले शिवानी ने केदारनाथ आपदा के बाद लोगों के मन में बैठे डर को दूर करने के लिए नवम्बर २०१४ में चलो केदारनाथ ट्रेकिंग कैम्पिंग शिविर के जरिये 38  युवाओं की टीम के साथ पूरी केदारपुरी का भ्रमण और अध्यन किया। और तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक रिपोर्ट सौंपी। जबकि २०१५ में एक बार फिर २५ सदस्यों के दल के साथ चलो केदारनाथ के जरिये सुरक्षित केदारनाथ यात्रा का सन्देश देश और दुनिया को दिया। 

अपनी पूरी टीम के साथ दीपवाली मनाकर ख़ुशी का उल्लास केदारनाथ में  दीप जलाकर ही मना। 

अक्तूबर २०१६ में उत्तराखंड सरकार के ""हिटो केदार""" कार्यक्रम के जरिये शिवानी ने अपने नेतृत्व में ३५ लड़कियों के ग्रुप के साथ चौमासी- खाम बुग्याल- रामबाड़ा- केदारनाथ – ट्रैक से ३६ किमी का सफर तय कर सुखद केदारनाथ यात्रा का सन्देश भी दिया । जिसके लिए शिवानी को सम्मानित भी किया गया था, इसके अलवा शिवानी उत्तरकाशी से लेकर टिहरी, पौड़ी से लेकर चमोली और रुद्रप्रयाग में साहसिक खेलों को बढ़ावा देने के लिए अपनी टीम के साथ कई ट्रैक कर चुकीं है।

शिवानी को उसके कार्यों के लिए समय समय पर सम्मानित भी किया जाता रहा है। २००४ में शिवानी को विज्ञानं भवन दिल्ली में बाल उत्कृष्ट अवार्ड (एडवंचर पैराग्लाइडिंग) मिला। जबकि २००४ में तत्कालीन मुख्यमंत्री उत्तराखंड नारायणदत तिवारी ने पैराग्लाइडिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए १५ अगस्त २००४ को सम्मानित किया। २००८ में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी और २०१० में  महामहिम राज्यपाल मार्गेट अल्वा द्वारा भी राजभवन देहरादून में सम्मानित किया जा चूका है। २०१४ में शिवानी को राज्यस्तरीय ""तीलू रैतोली"" पुरूस्कार से नवाजा जा चूका है। वहीं २०१६ में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा ""उत्तराखंड की बेटियां""" सम्मान से नवाजा गया। इसके अलावा २०१५ में ""यूथ आइकॉन"" सम्मान और २०१६ में प्रथम उत्तराखंड उदय सम्मान में उल्लेखनीय कार्य हेतु ""पीपुल्स चॉइस अवार्ड""सहित दर्जनों अन्य सम्मान भी मिल चुकें हैं। शिवानी को ""उत्तराखंड ईयर बुक""""में भी स्थान मिला है। जबकि शिवानी वर्तमान में उत्तराखंड "कयाकोइंग-केनोइंग एशोसिएशन""की कोषाध्यक्षा भी है।

शिवानी गुसांई से हुई लम्बी गुफ्तगू पर कहती हैं की में अपने पहाड़ को ""एडवंचर पर्यटन""से जोड़ना चाहती हूँ। ताकि युवा पहाड़ों की और आकर्षित हो। मैं चाहती हूँ की बच्चों में नशा और मानसिक विकृति की जगह ""प्रकृति के प्रति नशा""और प्यार हो और वो पहाड़ों की सैर करें। जिससे उत्तराखंड के पर्यटन और तीर्थाटन को नई ऊंचाईयां मिल सके,

कहतीं हैं की पुरे विश्व पटल से  देश विदेश के लोग पहाड़ की सुंदरता और शांति से अभिभूत हो हर साल देवभूमि का रुख कर रहें हैं। जबकि हम अपने स्वर्ग जैसे पहाड़ को वीरानी में धकेल करके पलायन कर रहें हैं। जो की सुखद नहीं है। जब तक हम खुद अपने पहाड़ के दुःख दर्दों को दूर करने का प्रयास नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा ---??? ।

पहाड़ में रोजगार सृजन के अवसरों की कमी नहीं है। केवल कुछ करने की ललक, जज्बा और होंसला चाहिए होता है। राज्य बने १७ साल बीत जाने को है लेकिन यहाँ की सरकारों ने पहाड़ों के विकास के लिए कोई ठोस धरातलीय कार्यों को अमलीजामा नहीं पहनाया। और जो लोग अपने अपने स्तर से कार्य भी कर रहें हैं उन्हें कभी भी प्रोत्साहन नहीं दिया। बल्कि उनकी निरंतर उपेक्षा कर हतोत्साहित करने का कार्य किया। सरकारें आये दिन भाषणों में खेलो और साहसिक खेलों में उल्लेखनीय कार्य करने वाले युवाओं को उचित सम्मान और सरकारी नौकरी देने की बात तो कहती है लेकिन हकीकत सफर तक सिमित होकर रह गया है। ऐसे में कोई युवा क्यों इस और अपना भविष्य बांचेगा ---??? लेकिन में इन सबसे हार मानने वाली नहीं हूँ, क्योंकि मै पहाड़ की माटी की बेटी स्वयं एक चटान हूँ। पहाड़ की बेटी ने कभी भी हारना नहीं सीखा है।

""बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ"" के तहत आज बड़ी बड़ी बातेँ हो रही हैं,,,,पर हमारी माँ जी ने  हम सब बहनों को सब प्रकार की शिक्षा देकर हमारी ही नहीँ समाज के लिए प्रेरणा हैं।

मैंने अपनी जिद और होंसलों से अपना रास्ता खुद तय किया है, मेरी माँ के सामाजिक संघर्षों ने हमेशा से ही मुझे कुछ अलग करने की प्रेरणा दी है। साथ ही परिवार से हर कदम पर सहयोग और आत्मविश्वास मिला। मै चाहती हूँ कि पहाड़ के लोग पहाड़ छोड़ कर पलायन न करें बल्कि पहाड़ में ही रोजगार के अवसरों का सृजन कर नई इबादत खुद लिखें। क्योंकि पहाड़ियों ने कभी भी हारना नहीं सीखा है। आज पूरे देश में पहाड़ी छाये हुये है। 

शिवानी ने अपनी माँ के साथ राज्य के आंदोलन में भी रैलियों में बैनर पकड़ कर आगे आगे चलना इनकी अपनी पहचान बनी।और शहीदो के सपनो को याद करते हुए कहती हैं कि 17 बर्षो में आज भी हमारा पहाड़ में कोई खास प्रगति नही हुई बल्कि, आज प्रदेश को ६  मुख्यमंत्री देने वाले पौड़ी जनपद की बदहाली पर भी कहती है कि यहाँ के राजनीति के पैरोकारों में राजनैतिक इच्छाशक्ति का घोर अभाव है। 

वरना कभी जिस"गढ़वाल कमिश्नरी" की हनक पूरे अभिभाजित उत्तर प्रदेश में थी।आज वही कमिश्नरी वीरान पड़ी हुई है। राज्य बनने के बाद तो यहाँ विकास का पहिया रुक सा गया है।- पौड़ी में रांसी स्टेडियम,निर्माणाधीन बस अड्डा, नानाघट पेयजल योजना,सूना सूना पडा मण्डल मुख्यालय विकास की गति का एक जीगता जागता उदाहरण है। हकीकत तो अत्यधिक भयवाह है। मैं चाहती हूँ की पौड़ी की खोयी रौनक वापस लौटे, जिसके लिए भागीरथ प्रयास की नितान्त आवश्यकता है ।

वास्तव में शिवानी गुसाईं आज पूरे देश के युवाओं के लिए "आइकॉन"और प्रेरणास्रोत है। भले ही वो १०० मीटर के ट्रैक पर फराटा दौड़ नहीं लगाती हो और न ही हवा से तेज जेट विमान उडाती है। परन्तु पैराग्लाइडिंग से लेकर पर्वतारोहण, स्कींग, राफ्टिंग, केम्पिंग, ट्रेकिंग में शिवानी ने पहाड़ के गाड़, गदेरे, बुग्याल, ग्लेशियर, नदियों के उद्गम स्थल की ख़ाक छानी है। यदि ऐसे में उन्हें "पहाड़ की उड़न परी"कहकर संबोधित किया जाया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिसकी वो असली हकदार भी है। ऐसे युवाओं को हर कदम पर प्रोत्साहित किये जाने की दरकरार है ताकि अन्य लोग भी इनका अनुसरण करें ।

ग्राउंड जीरो से इस लेख के जरिए बुलंद होंसलों के जरिये सपनो को हकीकत में बदलती "पहाड़ की उड़न परी"को उसके साहसिक कार्यों के लिए हमारी ओर से एक छोटी सी भेंट है। शिवानी का कार्य न केवल अनुकरणीय है अपितु एक नजीर भी, पहाड़ की ऐसी बेटी को नमन ।

क्रेडिट्स ग्राउंड जीरो से संजय चौहान।

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